Monday, June 25, 2018

नाप लो नभ

नाप लो नभ का हर कोण
पर क्षितिज वहाँ भी है।
हर सूरज अपना क्षितिज जानता है।
अपने उगने की परिधि जानता है।
इसलिये हरदिन उगता है
असीम विस्तार पाता है।
दिवसावसान पर क्षितिज में
सिमट जाता है।
अस्त होकर भी उदित होता है।

आकाश निहारो तुम

तुम अपनी इन आँखों में
भावों का कई पड़ाव लिये
घूम रहे हो।
फिर यह सूनापन क्यों
जो क्षितिज को निर्निमेष
घूर रहे हो?
भावों की एक तरंग
लाओ तुम
शून्य हो
क्षितिज पर
टकटकी बाँधे नयनों को
शिखर पर टिकाओ तुम।
क्षितिज से अंतरिक्ष
शून्य से शिखर
के मार्ग में
मिलेंगे बहुत से भाव
उन उदात्त भावों को
नयनों में बसाओ तुम
हृदय में उतारो तुम
मानस में धारो तुम
क्षितिज से ऊपर उठ
आकाश निहारो तुम।।
@ममतात्रिपाठी

जीवन का वह पड़ाव

जीवन के उस पड़ाव पर
जब ज्ञानेन्द्रियाँ क्षीण हो जाती हैं
कर्मेन्द्रियाँ जीर्ण हो जाती हैं।
तब उभयेन्द्रिय मन
और भी उत्सुक हो
उत्फुल्ल हो
इच्छाओं को
उड़ेलने लगता है
आकांक्षाओं को कुरेदने लगता है
सुप्त लालसाओं को
जगाने लगता है।
इसलिये ज्ञानेन्द्रियों
और कर्मेन्द्रियों की
सबलतम स्थिति में
इन पर नियंत्रण आवश्यक है।
अन्यथा मन तो चंचल है
इच्छाओं का सर्जक है
वाहक है।
@ममतात्रिपाठी

ग्रीष्म

ग्रीष्म में दहकते वनों की
शोभा पलाश
चट्टानों में, वीरानों में
एकाकी हो खिलते पलाश
सूख चुकी आशाओं में
तुम जंगल की आग बन
फिरते पलाश
मृत-आशाओं की
जिजीविषा तुम
तुम्हीं नव-आस
जंगल के एकाकी पलाश।
तुम घोर रुदन में
मधुर हास
बुझती जिजीविषाओं के
जीवन-प्रकाश।
तुम निर्जन प्रकृति के
मुक्त हास।
तुम शुष्क भूमि के
जीवन-आधार।
तुम नैराश्य उदधि के
आशान्वित पतवार।
तुम उगते हो, तुम खिलते हो
एकाकी ही शत-शत बार।
शुष्क हो रहे वन-विटपों में
तुमसे ही वासंती बयार।

आशायें

आशाओं की कभी साँझ नहीं होती
आशाओं का अवसान नहीं होता
आशाओं का नूतन विहान होता है
आशायें जगती हैं
प्राची की लाली लेकर
आशायें सजती है
उल्लास और खुशहाली लेकर
आशाओं की कभी रात नहीं होती
आशायें कभी ढलती नहीं
आशायें कभी मरती नहीं
बल्कि जन्म देती हैं
नयी आशाओं को
अपने गर्भ में पालती हैं
मानव मन की
अनन्त अभिलाषाओं को।
इसलिये आशायें अन्त नहीं होतीं
अनन्त होतीं हैं।
एक-एक आशा
अनन्त आशाओं का
सर्जन करती है।
सोते-जागते
आँखों में स्वप्न पालती है।
आशायें जीवन को सक्रिय बनाती हैं
जीवन में आग भरती हैं।
आशायें मन की डोर को
विचलन से बचाती हैं
और आशापूर्ति के मार्ग पर चलाती हैं।
हर आशा की पूर्ति
नयी आशा का उत्स है
इसलिये आशायें अपूर्ण हैं
और अनंत है
न इनका कभी अंत है।
ये जीवन की कहानी की
अपरिहार्य पृष्ठ हैं
जिनका जीवन
हमारे जीवन से भी बड़ा है
क्योंकि हमारी आशाओं का जीवः
हमारे अपने भी जीते हैं
वे भी हमारी आशाओं के अनंत मार्ग पर चलते हैं
रहा हमारी आशाओं अपेक्षाओं से
एकाकार हो जाते हैं

निरन्तरता

कल पर्णविहीन थीं शाखायें
गतिमान पवन की प्रीति में
पत्ते भी साथ छोड़ गये थे
भले ही कुछ पल बाद वे
निष्प्राण भूमि पर बिखरे पड़े थे।
आज शाखायें पुनर्जीवित हो उठीं हैं
पल्लवों की ताम्राभा से भर उठी हैं।
अब वे ताम्र-हरित वर्ण के चमकते
लहलहाते पत्तों से खिल उठी हैं।
दूर कल का खिन्न भाव
खनकती हँसी बिखरी हुयी है।
नव पल्लवों की चमक से
शाख-शाख निखरी हुयी है।।
जीवन की यही गति है।
पतनोत्थान जीवन की नियति है।
उत्थान के लिए पतन अपरिहार्य है।
विस्तार हेतु संकुचन शिरोधार्य है।
पतन ही आधार है नव-विकास का।
अंधकार आधार है नव-प्रकाश का।
बस धैर्य धरना चाहिए।
निरन्तर आगे बढ़ना चाहिए।।
@ममतात्रिपाठी

आसमान ताकती आँखें

आसमान ताकती आँखें
खो देती हैं तब ताकत
जब मौसम की मार
पड़ती असमय आकर
कभी वर्षा, कभी बाढ़
कभी सूखा, कभी अकाल
सामर्थ्य की थाह
लगा जाता है।
ताकतवर मनुष्य को
ताकत का पैमाना
बता जाता है।
सूख जाती है
खेतों में लगी हरियाली
डूब जाती है
पौधों की फुनगी
दूर्वा सूखकर
तिनका बन जाती है
सृष्टि जब
आह भरती है।
ताल-तलैया
नदी और पोखर
सूख जाते हैं
चिटक जाती है माटी
दरार उभर आती है।
दुनिया दुर्दिन हटाने में
सुदिन लाने में
जुट जाती है।
थमते हैं मनुष्य के
दम्भपूर्ण कदम
और वह फिर बनाने लगता है
प्रकृति से तारतम्य।।
@ममतात्रिपाठी

नाप लो नभ

नाप लो नभ का हर कोण पर क्षितिज वहाँ भी है। हर सूरज अपना क्षितिज जानता है। अपने उगने की परिधि जानता है। इसलिये हरदिन उगता है असीम विस्त...