कीर्ति सब धुल गयी
यश सब मिट गया।
घोटाले में क्या फँसे
सब कुछ सिमट गया।।
मिटाये थे सबूत
बड़े जतन से।
की थी जो गद्दारी
अपने वतन से।
सोचा था
किसी को भनक न लगे
बस मिलते रहे हमें
नित नये तमगे,
नित नये ओहदे,
पर समय से पहले
पाँसा पलट गया।
घोटाले में क्या फँसे
सब कुछ सिमट गया।।
4 comments:
बहुत सुन्दर कटाक्ष है
घोटालेबाजों का सब कुछ सिमटना अभी बाकि है.
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एक अच्छी रचना!
घोटालो की महिमा न्यारी
कोई कितना भी कोशिश करले जो सच है वो एक दिन सामने आना ही है.
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