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Tuesday, November 21, 2017

जियो तो ऐसे जियो


जियो ऐसे जियो
सजग रहो सर्वदा
कि तुम्हारी भावनायें
किसी की संभावनाओं में
बह न जायें।
और जीवन
दूसरो का सपना
पूरा करते-करते
ढल न जायें।
नयन दूसरों के
सपने में खोकर
अपना स्वप्नमय स्वभाव
भूल न जायें।।

मशीनीकरण एवं हमारी भावनायें

मशीनीकरण के युग में
हम इतने आगे निकल गये हैं
कि हमारे शब्द
और हमारी भावनायें भी
 मशीन बनकर रह गये हैं।
अब शब्दों और भावों के
वे टकसाल नहीं
जो शब्दों को माँजकर
भावों को आकार दे
एक नया रूप गढ़ते थे
और नयी भावनाओं की
सम्भावनाएं मुखर होती थीं
पुरानी लीक से अलग
नयी लीक बनती थी
जिसमें सनी रहती थी
पुरानी खुश्बू
पर नयी उमंग रहती थी।
ठहराव नहीं वहां
प्रवाह दिखता था
शब्दों का भावनाओं का
भावों का और
नयी नवेली कथाओं का।
सब जीवन्त लगता था
बिना किसी बंधन के
अनन्त लगता था।

यथार्थ

रिश्ते-नाते, जान-पहचान औ हालचाल सब जुड़े टके से। टका नहीं यदि जेब में तो रहते सभी कटे-कटे से।। मधुमक्खी भी वहीं मँडराती मकरन्द जहाँ वह पाती ...