Showing posts with label agriculture. Show all posts
Showing posts with label agriculture. Show all posts

Saturday, November 25, 2017

टमाटर की विकासयात्रा

चित्र : साभार Google 
अद्भुत अनुसंधान है
अन्न-शाक-सब्जी सबके
बदल गये हैं रंग-ढंग
बढ़ा आयतन-द्रव्यमान है।
कल तक जो टमाटर
तनिक पारदर्शी दिखता था
पतली परतयुक्त
रसभरा  रहता था
आज मोटा आवरण ले
इधर-उधर दौड़ रहा।
एक बार टूटा तो महीने भर
तराजू उसे तौल रहा।
अद्भुत नयी-ताजी
उसकी मुस्कान है।
महीने भर में भी मुख
तनिक भी न म्लान है।।
कीड़े-मकोड़े
पास न फटकते
मुक्त है वह इन सबसे
उसको इसका अभिमान है।
शुरू-शुरू में जब
बाजार वह जाता था।
दुकानों पर सजता था
हाथोहाथ बिकता था।
और अपने ही पूर्वजों को
मुँह चिढ़ाता था।
उन्हें ओछा बताता था
उनके रंग-रूप पर हँसता था।
अपना चटक लालरंग दिखा
खूब इतराता था।
ग्राहकों के मन को भी
वह खूब लुभाता था
इसलिए झटपट बिक जाता था।
ऐसे धीरे-धीरे उसने
छोटे, थोड़े चिपटे
थोड़े लाल, गहरे-हल्के हरे
खट्टे - कसैले टमाटरों को
बाजार से धकेल
बाहर कर दिया
फिर उनके हिस्से की
जमीन हड़प लिया।
और खुद मुस्कुराते हुये
उगने लगा
दिनोदिन बढ़ने फूलने लगा।
पट गयी बाजार
लाल-लाल समधर्मी
समवर्णी टमाटरों से।
गायब हो गया देशी टमाटर
और उसी के साथ उसका
स्वाद बेहतर।
अब बस टमाटर का
रंग बचा है
उसका प्राण जा चुका है
अब फिर से
उल्टी गिनती शुरू हो रही है
समाज फिर स्वाद के लिए।
दौड़ने लगा है
मोहभंग हो गया है
उका लाल टमाटर से
और वह फिर उसी
 पुराने स्वाद को ढूंढ़ने लगा है।

Friday, November 24, 2017

खेती - किसानी कै आपन कहानी है

चित्र:साभार Google 
खेती किसानी कै
आपन कहानी है 
कब्बौ पड़े सूखा
कब्बौ बरखा कै पानी है। 
खेती किसानी कै
आपन कहानी है। 
कब्बौ खेत झुराय
कब्बौ भरा पानी है
कब्बौ बहिया बहे
लागे दैव नहात हैं 
कब्बौ पड़े झूरा जैसे
दैव अँचवत हाथ हैं। 
नीक उपजै अन्न तौ
मन होय प्रसन्न 
लकिन तब्बौ
उपज कै दाम देखि
किसान मरणासन्न।। 
खेती खराब तौ
मानौ दैव विपद् दिहिन
पीठ पेट एक किहिन
अकाल जेस दिन भवा
मुँह का जाबि दिहिन।। 
नीक हुवै तौ
बेकार हुवै तौ
साँझ-दुपहर-रात 
सकार हुवै तौ
किसान के आँख मा
आठौ याम पानी है। 
खेती किसानी कै
आपन कहानी है। 
मेढ़-मेढ़ खेत बँटा
मेढ़ेस बँटा खरिहान
पानी कै बूँद बँटी
झगड़ा है साँझ-विहान।। 
गोबर कै खाद पटी
यूरिया मुँह चिढ़ावत ही। 
गरीब के खेत पाँस देखि
डाई मुँह बिरावत ही।। 
खरिहाने मा धानेक पयारी
मुँह उसकावत ही। 
अपनक कम देखि 
छोट खेतेक उपजि
बड़की बखार से 
नजर चोरावत ही।। 
हाइब्रिड धनवा तनी देखौ
बहुत इतरात है। 
खरिहाने से सीधा
बजार चला जात है।
वहका चुरवै का
चूल्हा पछतात है 
पर किसान देखौ अबहिंउ
वहै पुरान भात खात है।
वहके भोजन कै आपन
अलग कहानी है। 
सबसे बड़ा रंक वहै
जे सबसे बड़ा दानी है। 
खेती किसानी कै 
आपन कहानी है। 
@ममतात्रिपाठी 





Tuesday, November 21, 2017

किसान और खेती

खेत
हाँ खेत
ठीक से जुते हुये
तैयार हैं
उसकी माटी
ठीक से भुरभुरी है
कंकड़ पत्थर
प्लास्टिक और कांच के टुकड़ों को
एक-एककर बीनकर
किसान ने माटी छानकर
अलग कर दिया है
मेढ़ के किनारे
उनका कूरा लगा दिया है
अब माटी मुलायम है
थोड़ी नम है
और भुरभुरी है
बचे खुचे ढेलों को
तोड़ने के लिए
खेत हेंगा दिया गया है
और किसान खेत बोने के लिए
तैयार है
आलू, लहसुन, प्याज सब
अँखुआ गये हैं
धनिया भी दरकर
भिगोई गयी है
अँखुवाने के लिए
कुछ ओधी भी लायी गयी है
भाँटा , टमाटर, गोभी, मिर्चा की
मूली का बिया भी तैयार है
आलू के सेल्ही के बीच
बोये जाने के लिए
अब किसान
एक-एक कर
चुनकर सलीके से बोयेगा
हर बीज
लगायेगा हर ओधी
लहलहा उठेगा खेत
अद्भुत हरियाली से।
तैयार होगी फसल
कुन्तलों आलू, प्याज, लहसुन,
टमाटर, भांटा, मिर्चा, मूली, धनिया।
लेकिन किसान का यह
लहलहाता धन
पककर-कटकर
फिर
माटी के मोल बिकेगा
और किसान फिर
फटे वस्त्रों से
अपना तन ढकेगा
रसेदार सब्जी और
बुड्डी मारने पर
दाल का दाना मिलने वाली दाल पर
साल भर अपना व
परिवार का पेट भरेगा।
फिर लग जायेगा
अगली फसल बोने में
पसीना बहाने
फसल लहलहाने में।

यथार्थ

रिश्ते-नाते, जान-पहचान औ हालचाल सब जुड़े टके से। टका नहीं यदि जेब में तो रहते सभी कटे-कटे से।। मधुमक्खी भी वहीं मँडराती मकरन्द जहाँ वह पाती ...