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Wednesday, November 22, 2017

तू बड़का बरवार नहीं?

वै काम करैं, तू कर तूरौ।
तुहँका घोहरावैं, तू घुइरौ।
पाँव पसारि कै तू सोवौ
औ उनके जागैऽप आँख तरेरौ।
अब बोलौ तू सत्तुवार नहीं ।
तू बड़का बरवार नहीं ।
*सत्तुवार=जिसके पास कोई काम न हो
*बरवार=जेबकतरे का एक प्रकार जो पीछा करके जेब काटता है।

Tuesday, November 21, 2017

जियो तो ऐसे जियो


जियो ऐसे जियो
सजग रहो सर्वदा
कि तुम्हारी भावनायें
किसी की संभावनाओं में
बह न जायें।
और जीवन
दूसरो का सपना
पूरा करते-करते
ढल न जायें।
नयन दूसरों के
सपने में खोकर
अपना स्वप्नमय स्वभाव
भूल न जायें।।

धुंध : शुतुर्मुर्गी समाधान

धूल-धुँये की मोटी परत
जिद्दी हो गयी है
धुंध बनकर छायी है
न हटने के लिये।
यह सामान्य समस्या नहीं
आपदा है।
वे फुलझड़ियों से
निदान की बात करते हैं
और कहते हैं
बंद कर दो
विद्यालयों को
घर में कैद रखो
नौनिहालों को।
पर कौन बताये उनको
इतनी अक्ल भी नहीं
कि हवायें
मकान और कूड़ेदान में
फर्क नहीं करतीं।
प्रदूषित धुँये
और यज्ञ के धूम में
अन्तर नहीं करतीं।
आर-पार जाती हैं बेधड़क
वो भार ढोते हुये
जो तुमने उनपर लादा है
प्रदूषण करते हुये।
बच्चों को कैद करना
इसका निदान नहीं है।
या तो ऐसा सोचने वालों को
सच में संकट का अनुमान नहीं है।
या तो वे ऐसे लोग हैं
जो गटक जाते हैं प्रकृति को
जनता की सुलभ संपत्ति को
और स्वयं धनकुबेर बन
जनसमस्याओ का
प्राइवेट समाधान खोज सकते हैं
वे आॅक्सीजन और मास्क खरीद सकते हैं
इसलिये उन्हें विषैली धुंध का
तनिक भी भय नहीं
वे निर्भय हैं।

तितलियाँ

तितलियाँ
रंग-बिरंगी तितलियाँ
काली, कुछ नीली,
कुछ धानी-कजरारी
कुछ उज्जवल,
कुछ चंचल तितलियाँ।
कुछ चितकबरी
कुछ बूटेदार
लहरिया वाली तितलियाँ
कुछ छोटी कुछ बड़ी
कुछ मद्धिम कुछ तेज
यहाँ वहाँ उड़तीं
फूलों, पेड़ों, पत्तियों की
दूरियाँ नापती तितलियाँ।
छोटे से जीवन को
गिनती के दिनों को
अपने हिस्से के
मुट्ठी भर प्रकाश को
जिंदादिली से
हँसकर-खिलखिलाकर
रंग बनकर-बिखेरकर
मुक्त-मन से जीतीं तितलियाँ।।
जियो तो खुलकर जियो
रंग भर दो हर दिशा में
मुक्त - मन जीवन जियो
प्रकाश बन टिमटिमाओ निशा में।।
तितलियाँ तितलियाँ ही नहीं हैं
जीवन की आशायें हैं
तितलियाँ हैं तो रंग बिरंगी है प्रकृति
इन्द्रधनुषी दिशायें हैं।।

यथार्थ

रिश्ते-नाते, जान-पहचान औ हालचाल सब जुड़े टके से। टका नहीं यदि जेब में तो रहते सभी कटे-कटे से।। मधुमक्खी भी वहीं मँडराती मकरन्द जहाँ वह पाती ...