Showing posts with label pollution. Show all posts
Showing posts with label pollution. Show all posts

Tuesday, November 21, 2017

भीषण जल संकट

साभार: Google 

सूखा ताल
चिकनी माटी में
भयंकर फटी बिवाईं से
भयंकर दरार
उसी के बीच फँसा
तड़पकर मर गयी
सूखकर काँटा हो गयी
ताल की स्निग्ध
मछली का कंकाल
सूखकर खर हो गयीं
चंद घासों का गुच्छ
और एक मरियल सा बगुला
ध्यान से भटका हुआ
कभी ताल की तलहटी के
चिटकन में पानी तलाशता हुआ
कभी माटी-मछली की गति पर
हैरान होता हुआ
बेचारा मरियल सा बगुला।
....... ये दृश्य हमारी संवेदना को
खोजी पिपासा को
और उपभोक्तावादी होकर भी
मानवतावादी होने के ढोंग को
नये तथाकथित ढोंगी
संवेदनशील सौन्दर्य-संवेदना
के साथ
उजागर करता है
और यह भी तमाचा मारता है कि
ताल को किसने पिया है
 मछली का ये हाल किसने किया है।

गाँव का हेंवँत

गाँव में हेंवँत का सबेर
कुहरा का लबादा ओढ़कर आता था
पर...
पर देश की राजधानी में
दिनभर कुहरे सी चादर तनी है
पर यह कुहरा नहीं है
धुंध है
जो धूल और प्रदूषण को
आँचल में लिये
भीषण दिख रही है।।
पर...
आश्चर्य है कि
धुंध में ढँकी दिल्ली
अब भी हँस रही है।
या बेबस हो हँस रही है।

धुंध : शुतुर्मुर्गी समाधान

धूल-धुँये की मोटी परत
जिद्दी हो गयी है
धुंध बनकर छायी है
न हटने के लिये।
यह सामान्य समस्या नहीं
आपदा है।
वे फुलझड़ियों से
निदान की बात करते हैं
और कहते हैं
बंद कर दो
विद्यालयों को
घर में कैद रखो
नौनिहालों को।
पर कौन बताये उनको
इतनी अक्ल भी नहीं
कि हवायें
मकान और कूड़ेदान में
फर्क नहीं करतीं।
प्रदूषित धुँये
और यज्ञ के धूम में
अन्तर नहीं करतीं।
आर-पार जाती हैं बेधड़क
वो भार ढोते हुये
जो तुमने उनपर लादा है
प्रदूषण करते हुये।
बच्चों को कैद करना
इसका निदान नहीं है।
या तो ऐसा सोचने वालों को
सच में संकट का अनुमान नहीं है।
या तो वे ऐसे लोग हैं
जो गटक जाते हैं प्रकृति को
जनता की सुलभ संपत्ति को
और स्वयं धनकुबेर बन
जनसमस्याओ का
प्राइवेट समाधान खोज सकते हैं
वे आॅक्सीजन और मास्क खरीद सकते हैं
इसलिये उन्हें विषैली धुंध का
तनिक भी भय नहीं
वे निर्भय हैं।

प्रकृति तुम धन्य हो

प्रकृति तुम धन्य हो
उपेक्षा में अपेक्षा में
खोज लेती हो जीवन
और स्पन्दित हो उठती हो।
प्रकृति तुम धन्य हो
शोषण नजरअंदाज कर
तिरस्कार भूलकर
तुम पोषित करती हो
पृथ्वी का आँचल
रंगों से भरती हो।
प्रकृति तुम धन्य हो।
तुम्हीं से आग पा
जगती जागृत है।
तुम्हीं से पराग पा
मधुमक्खी रचती
मधु-अमृत है।
सबके जीवन का
आश्रय हो तुम
प्रकृति तुम धन्य हो।।

प्रदूषण और प्रकृति

 तितली दम तोड़ती हुयी

धूल से लदे पेड़
भार से दबकर
उल्टी होतीं पत्तियाँ
हिलने में असमर्थ हो
रो पड़ी हैं।
उनका क्रन्दन देख
अन्ततः स्थावर
बोल पड़ा।
शीत से बचने के लिए
तुषार से लड़ने के लिए
हम सशक्त हो खड़े थे
पर अब हम असहाय हैं
धूलि से सने हुये
स्थिर हो खड़े हुये।
छिनगाओ हमारी शाखायें
सूख जाने दो पत्तियों को
गिरकर सड़ जाने दो पत्तियों को
मिट्टी में मिल जाने दो
मेरी शाखाओं और पत्तियों को।
मिट्टी में मिलना
इस धूलि को ढोने से बेहतर है

यथार्थ

रिश्ते-नाते, जान-पहचान औ हालचाल सब जुड़े टके से। टका नहीं यदि जेब में तो रहते सभी कटे-कटे से।। मधुमक्खी भी वहीं मँडराती मकरन्द जहाँ वह पाती ...