आपन कहानी है
कब्बौ पड़े सूखा
कब्बौ बरखा कै पानी है।
खेती किसानी कै
आपन कहानी है।
कब्बौ खेत झुराय
कब्बौ भरा पानी है
कब्बौ बहिया बहे
लागे दैव नहात हैं
कब्बौ पड़े झूरा जैसे
दैव अँचवत हाथ हैं।
नीक उपजै अन्न तौ
मन होय प्रसन्न
लकिन तब्बौ
उपज कै दाम देखि
किसान मरणासन्न।।
खेती खराब तौ
मानौ दैव विपद् दिहिन
पीठ पेट एक किहिन
अकाल जेस दिन भवा
मुँह का जाबि दिहिन।।
नीक हुवै तौ
बेकार हुवै तौ
साँझ-दुपहर-रात
सकार हुवै तौ
किसान के आँख मा
आठौ याम पानी है।
खेती किसानी कै
आपन कहानी है।
मेढ़-मेढ़ खेत बँटा
मेढ़ेस बँटा खरिहान
पानी कै बूँद बँटी
झगड़ा है साँझ-विहान।।
गोबर कै खाद पटी
यूरिया मुँह चिढ़ावत ही।
गरीब के खेत पाँस देखि
डाई मुँह बिरावत ही।।
खरिहाने मा धानेक पयारी
मुँह उसकावत ही।
अपनक कम देखि
छोट खेतेक उपजि
बड़की बखार से
नजर चोरावत ही।।
हाइब्रिड धनवा तनी देखौ
बहुत इतरात है।
खरिहाने से सीधा
बजार चला जात है।
वहका चुरवै का
चूल्हा पछतात है
पर किसान देखौ अबहिंउ
वहै पुरान भात खात है।
वहके भोजन कै आपन
अलग कहानी है।
सबसे बड़ा रंक वहै
जे सबसे बड़ा दानी है।
खेती किसानी कै
आपन कहानी है।
@ममतात्रिपाठी
