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Tuesday, November 21, 2017

गाँव का हेंवँत

गाँव में हेंवँत का सबेर
कुहरा का लबादा ओढ़कर आता था
पर...
पर देश की राजधानी में
दिनभर कुहरे सी चादर तनी है
पर यह कुहरा नहीं है
धुंध है
जो धूल और प्रदूषण को
आँचल में लिये
भीषण दिख रही है।।
पर...
आश्चर्य है कि
धुंध में ढँकी दिल्ली
अब भी हँस रही है।
या बेबस हो हँस रही है।

धुंध : शुतुर्मुर्गी समाधान

धूल-धुँये की मोटी परत
जिद्दी हो गयी है
धुंध बनकर छायी है
न हटने के लिये।
यह सामान्य समस्या नहीं
आपदा है।
वे फुलझड़ियों से
निदान की बात करते हैं
और कहते हैं
बंद कर दो
विद्यालयों को
घर में कैद रखो
नौनिहालों को।
पर कौन बताये उनको
इतनी अक्ल भी नहीं
कि हवायें
मकान और कूड़ेदान में
फर्क नहीं करतीं।
प्रदूषित धुँये
और यज्ञ के धूम में
अन्तर नहीं करतीं।
आर-पार जाती हैं बेधड़क
वो भार ढोते हुये
जो तुमने उनपर लादा है
प्रदूषण करते हुये।
बच्चों को कैद करना
इसका निदान नहीं है।
या तो ऐसा सोचने वालों को
सच में संकट का अनुमान नहीं है।
या तो वे ऐसे लोग हैं
जो गटक जाते हैं प्रकृति को
जनता की सुलभ संपत्ति को
और स्वयं धनकुबेर बन
जनसमस्याओ का
प्राइवेट समाधान खोज सकते हैं
वे आॅक्सीजन और मास्क खरीद सकते हैं
इसलिये उन्हें विषैली धुंध का
तनिक भी भय नहीं
वे निर्भय हैं।

प्रकृति तुम धन्य हो

प्रकृति तुम धन्य हो
उपेक्षा में अपेक्षा में
खोज लेती हो जीवन
और स्पन्दित हो उठती हो।
प्रकृति तुम धन्य हो
शोषण नजरअंदाज कर
तिरस्कार भूलकर
तुम पोषित करती हो
पृथ्वी का आँचल
रंगों से भरती हो।
प्रकृति तुम धन्य हो।
तुम्हीं से आग पा
जगती जागृत है।
तुम्हीं से पराग पा
मधुमक्खी रचती
मधु-अमृत है।
सबके जीवन का
आश्रय हो तुम
प्रकृति तुम धन्य हो।।

यथार्थ

रिश्ते-नाते, जान-पहचान औ हालचाल सब जुड़े टके से। टका नहीं यदि जेब में तो रहते सभी कटे-कटे से।। मधुमक्खी भी वहीं मँडराती मकरन्द जहाँ वह पाती ...