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Tuesday, November 21, 2017

बिरसा मुंडा

जंगल में जगाई
क्रान्ति की अलख
जग गये वन
और बंशी की धुन छोड़
रण-बिगुल बजाने लगे
कल तक जो निरीह थे
नाको चने चबवाने लगे।।
बिरसा के नेतृत्व में
वह शौर्य और सुवास था
कि वन अपनी सौम्यता को
किनारे रख जाग उठा।
कह उठी भोली-भाली जनता
अब न सहेंगे अत्याचार
अब चढ़ेगी प्रत्यंचा
अकिंचन तीर-धनुष से ही सही
पर करेंगे आतंक का प्रतिकार।।
बिरसा के शब्दों से
बिरसा के आह्वान से
उबल उठा स्वाभिमान से
आप्लावित हुआ
स्वाभिमानी रक्त की उफान से।।
बिरसा की क्रान्तिगाथा
सामान्य कहानी नहीं है
वह ऐसी शौर्यगाथा है
जिसने स्वतंत्रता संग्राम की
कहानी लिखी है।।

यथार्थ

रिश्ते-नाते, जान-पहचान औ हालचाल सब जुड़े टके से। टका नहीं यदि जेब में तो रहते सभी कटे-कटे से।। मधुमक्खी भी वहीं मँडराती मकरन्द जहाँ वह पाती ...