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Tuesday, November 21, 2017

विषपान कर जीवनदान करते वृक्ष

वो जी रहे हैं
अवांछित होकर
तिरस्कृत होकर
विष पीकर
धूल धूसरित हो
वे जी रहे हैं।
वे साँस ले रहे हैं
जबकि उनके फेफड़े
धूल के पहाड़ से
दब रहे हैं
वे जी रहे हैं।
अब भी वे विष पी रहे हैं।
प्राणवायु दे रहे हैं।
वे जी रहे हैं।
वे समादृत नहीं है
वे तिरस्कृत हैं
उपेक्षित हैं
फिर भी तिरस्कार सह
जी रहे हैं।
उनकी हरियाली
तभी नजर आती है
जब वर्षा
अपना स्नेह बरसाती है।
नहला देती है उनको
निखरता है उनका रूप
और वे चमक उठते हैं
चहँक उठते हैं।
तब लगता है
सच में वे जी रहे हैं।
शेष दिनों में
पूरे साल
यही लगता है कि
मूक हो वे बस
उपेक्षा औ प्रताड़ना
सह रहे हैं।
और बस जी रहे हैं
सिसककर नहीं
रोकर नहीं
दीन बनकर नहीं
अपितु उत्कट जिजीविषा के साथ
वे जी रहे हैं।
हमारे प्राण का आधार बुन रहे हैं।

प्रदूषण और प्रकृति

 तितली दम तोड़ती हुयी

धूल से लदे पेड़
भार से दबकर
उल्टी होतीं पत्तियाँ
हिलने में असमर्थ हो
रो पड़ी हैं।
उनका क्रन्दन देख
अन्ततः स्थावर
बोल पड़ा।
शीत से बचने के लिए
तुषार से लड़ने के लिए
हम सशक्त हो खड़े थे
पर अब हम असहाय हैं
धूलि से सने हुये
स्थिर हो खड़े हुये।
छिनगाओ हमारी शाखायें
सूख जाने दो पत्तियों को
गिरकर सड़ जाने दो पत्तियों को
मिट्टी में मिल जाने दो
मेरी शाखाओं और पत्तियों को।
मिट्टी में मिलना
इस धूलि को ढोने से बेहतर है

यथार्थ

रिश्ते-नाते, जान-पहचान औ हालचाल सब जुड़े टके से। टका नहीं यदि जेब में तो रहते सभी कटे-कटे से।। मधुमक्खी भी वहीं मँडराती मकरन्द जहाँ वह पाती ...