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Monday, April 13, 2020

वास्तविकता

वास्तविकता
हरियाली के बीच
पहाड़ में बहती
किसी नदी के
सुंदर चित्र सी
सदा सुंदर नहीं होती।
वास्तविकता
मूँगे की चट्टानों के
भव्य चित्रों सी
रंगबिरंगी भी
नहीं होती।
अपितु वह
इन्द्रधनुष सी होती है
सात रंग दिखाती है
पर दर्शन उसका
भयाक्रांत कर जाता है।
वास्तविकता
किसी पहाड़ के
पिछले पाट की भाँति
रंगहीन और
बंजर भी होती है।
वास्तविकता केवल
सघन वनों की हरियाली
चीरती लम्बी काली
सड़क नहीं होती
वह कंकरीला पथरीला
भाबर भी होती है।
@ममतात्रिपाठी 

Tuesday, November 21, 2017

भीषण जल संकट

साभार: Google 

सूखा ताल
चिकनी माटी में
भयंकर फटी बिवाईं से
भयंकर दरार
उसी के बीच फँसा
तड़पकर मर गयी
सूखकर काँटा हो गयी
ताल की स्निग्ध
मछली का कंकाल
सूखकर खर हो गयीं
चंद घासों का गुच्छ
और एक मरियल सा बगुला
ध्यान से भटका हुआ
कभी ताल की तलहटी के
चिटकन में पानी तलाशता हुआ
कभी माटी-मछली की गति पर
हैरान होता हुआ
बेचारा मरियल सा बगुला।
....... ये दृश्य हमारी संवेदना को
खोजी पिपासा को
और उपभोक्तावादी होकर भी
मानवतावादी होने के ढोंग को
नये तथाकथित ढोंगी
संवेदनशील सौन्दर्य-संवेदना
के साथ
उजागर करता है
और यह भी तमाचा मारता है कि
ताल को किसने पिया है
 मछली का ये हाल किसने किया है।

यथार्थ

रिश्ते-नाते, जान-पहचान औ हालचाल सब जुड़े टके से। टका नहीं यदि जेब में तो रहते सभी कटे-कटे से।। मधुमक्खी भी वहीं मँडराती मकरन्द जहाँ वह पाती ...