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Tuesday, November 21, 2017

जियो तो ऐसे जियो


जियो ऐसे जियो
सजग रहो सर्वदा
कि तुम्हारी भावनायें
किसी की संभावनाओं में
बह न जायें।
और जीवन
दूसरो का सपना
पूरा करते-करते
ढल न जायें।
नयन दूसरों के
सपने में खोकर
अपना स्वप्नमय स्वभाव
भूल न जायें।।

धुंध : शुतुर्मुर्गी समाधान

धूल-धुँये की मोटी परत
जिद्दी हो गयी है
धुंध बनकर छायी है
न हटने के लिये।
यह सामान्य समस्या नहीं
आपदा है।
वे फुलझड़ियों से
निदान की बात करते हैं
और कहते हैं
बंद कर दो
विद्यालयों को
घर में कैद रखो
नौनिहालों को।
पर कौन बताये उनको
इतनी अक्ल भी नहीं
कि हवायें
मकान और कूड़ेदान में
फर्क नहीं करतीं।
प्रदूषित धुँये
और यज्ञ के धूम में
अन्तर नहीं करतीं।
आर-पार जाती हैं बेधड़क
वो भार ढोते हुये
जो तुमने उनपर लादा है
प्रदूषण करते हुये।
बच्चों को कैद करना
इसका निदान नहीं है।
या तो ऐसा सोचने वालों को
सच में संकट का अनुमान नहीं है।
या तो वे ऐसे लोग हैं
जो गटक जाते हैं प्रकृति को
जनता की सुलभ संपत्ति को
और स्वयं धनकुबेर बन
जनसमस्याओ का
प्राइवेट समाधान खोज सकते हैं
वे आॅक्सीजन और मास्क खरीद सकते हैं
इसलिये उन्हें विषैली धुंध का
तनिक भी भय नहीं
वे निर्भय हैं।

तितलियाँ

तितलियाँ
रंग-बिरंगी तितलियाँ
काली, कुछ नीली,
कुछ धानी-कजरारी
कुछ उज्जवल,
कुछ चंचल तितलियाँ।
कुछ चितकबरी
कुछ बूटेदार
लहरिया वाली तितलियाँ
कुछ छोटी कुछ बड़ी
कुछ मद्धिम कुछ तेज
यहाँ वहाँ उड़तीं
फूलों, पेड़ों, पत्तियों की
दूरियाँ नापती तितलियाँ।
छोटे से जीवन को
गिनती के दिनों को
अपने हिस्से के
मुट्ठी भर प्रकाश को
जिंदादिली से
हँसकर-खिलखिलाकर
रंग बनकर-बिखेरकर
मुक्त-मन से जीतीं तितलियाँ।।
जियो तो खुलकर जियो
रंग भर दो हर दिशा में
मुक्त - मन जीवन जियो
प्रकाश बन टिमटिमाओ निशा में।।
तितलियाँ तितलियाँ ही नहीं हैं
जीवन की आशायें हैं
तितलियाँ हैं तो रंग बिरंगी है प्रकृति
इन्द्रधनुषी दिशायें हैं।।

ज्योत्स्ना के आँचल में...

हर हृदय में भार इतना
बोझ न स्वीकार इतना
पर चले ही जा रहे हैं
मन भरे ही जा रहे हैं।
उनींदी आँखें प्रभात में
कदम आगे है बढ़ाना
क्लान्त वदन म्लान है मुख
पर है सबसे छुपाना।।
हँसी नकली हो गयी है
मुस्कुराहट खो गयी है
देखने में चिर हँसी है
चेहरे पर मुस्कान बसी है।
पर किसे बतायें हृदयगाथा
कि हँसना भी बेबसी है।।
आँसुओं को औ रुदन को
थकान औ क्रंदन को
मुस्कुराहट में दफ्न करना
आता है युवा-मन को।।
गाड़ी-बंगला-नोकर-चाकर सब हैं
भौतिक सुविधाओं की भरमार है
कहने के लिये कुबेर हैं सब
पर अंतस् बेबस है कंगाल है।
सच है धन से वैभव मिल सकता है
पर संतोष नहीं मिला करता।
हँसी सच में वहीं नहीं बसती है
जहाँ है अबाध कंचन बरसता।
अब भी वैभव और सुख का
वही पुराना आँकड़ा है
वही पुराना ठिकाना है
सुख शांति हँसी खुशी मुस्कान को
अब भी वैभव के कंधे की
जरूरत नहीं पड़ती।
अब भी ज्योत्स्ना के आँचल में
चाँद जहाँ साक्षी बनता है
वहीं सुख-शांति का संतोषी ठिकाना है।
बाकी सब तो माया है
मिथ्या है भ्रम जाल है, बहाना है।। 

यथार्थ

रिश्ते-नाते, जान-पहचान औ हालचाल सब जुड़े टके से। टका नहीं यदि जेब में तो रहते सभी कटे-कटे से।। मधुमक्खी भी वहीं मँडराती मकरन्द जहाँ वह पाती ...