शीत का सहज स्पर्श पाकर
खिल उठा गेंदाफूल।
धरती ने पहन लिया फिर
गाढ़ा हरा रंग-बिरंगा दुकूल।।
प्रकृति में बिखर गया पराग
जागा शलभों में अनुराग।
विहँस उठा प्रकृति का कण-कण
अँगड़ाई लेने लगी अँगीठी की आग।।
तितलियाँ पीने लगीं मकरंद
आ रहे उनके वृंद के वृन्द
जगती जगती मधुसिक्त हुयी
पाकर फूलों की मधुर गन्ध।।
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