Monday, March 20, 2017

जनता का मत ताश नहीं है

जनता का मत ताश नहीं है न शतरंज है कि बाजी लगाया जीत गये जनता तलाशती है तराशती है फिर सजाती है अपनी बाजी और जिताती है उसे जिसे वो चाहती है

9 comments:

purushottam naveen said...

लोकतन्त्र की जीत के भावार्थ वाली बेहद सशक्त रचना।

purushottam naveen said...

लोकतन्त्र की जीत के भावार्थ वाली बेहद सशक्त रचना।

Digvijay Agrawal said...

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" मंगलवार 21 नवम्बर 2017 को साझा की गई है.................. http://halchalwith5links.blogspot.com पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

Ravindra Singh Yadav said...

वाह! सटीक।

Lokesh Nashine said...

बहुत उम्दा

दिगम्बर नासवा said...

ये तो पब्लिक है ये सब जानती है ...
अच्छी रचना ...

Anita Laguri "Anu" said...

जी अच्छी रचना..!!

सुशील कुमार जोशी said...

सुन्दर

NITU THAKUR said...

Atisunder....

यथार्थ

रिश्ते-नाते, जान-पहचान औ हालचाल सब जुड़े टके से। टका नहीं यदि जेब में तो रहते सभी कटे-कटे से।। मधुमक्खी भी वहीं मँडराती मकरन्द जहाँ वह पाती ...