किसी परिन्दे के पर की दुहाई मत दिया करो
हमे महफिल में तन्हाई मत दिया करो
हमें मालूम है कि तुम सूरज की रोशनी नही दे सकते
पर हमे स्याह रात की गहराई मत दिया कतो
हमें मालूम है कि तुम बसन्त की बहार नही दे सकते
पर कभी खिज़ा की रुखाई मत दिया करो
नन्दनवन के फूलों की हमें चाह नही
पर रेगिस्तानी काँटों का उपहार मत दिया करो
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यथार्थ
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2 comments:
बहुत अच्छी कविता है ।
धन्यवाद
किसी परिन्दे के पर की दुहाई मत दिया करो
हमे महफिल में तन्हाई मत दिया करो
bahut sundar rachna
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