Thursday, September 4, 2008

पर रेगिस्तानी काँटों का उपहार मत दिया करो

किसी परिन्दे के पर की दुहाई मत दिया करो
हमे महफिल में तन्हाई मत दिया करो
हमें मालूम है कि तुम सूरज की रोशनी नही दे सकते
पर हमे स्याह रात की गहराई मत दिया कतो
हमें मालूम है कि तुम बसन्त की बहार नही दे सकते
पर कभी खिज़ा की रुखाई मत दिया करो
नन्दनवन के फूलों की हमें चाह नही
पर रेगिस्तानी काँटों का उपहार मत दिया करो

2 comments:

Mukesh said...

बहुत अच्छी कविता है ।
धन्यवाद

प्रदीप मानोरिया said...

किसी परिन्दे के पर की दुहाई मत दिया करो
हमे महफिल में तन्हाई मत दिया करो
bahut sundar rachna

यथार्थ

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